- न्यूज मंत्रा लाइव एस्ट्रो डेस्क
दुर्गा पूजा का अंतिम दिन देवी विसर्जन कहलाता है। यह केवल मूर्ति को जल में प्रवाहित करने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि इसमें श्रद्धा, भक्ति और संस्कृति का गहरा संदेश छुपा होता है।
मां की विदाई में भावपूर्ण शब्द
विसर्जन के दौरान भक्त कहते हैं –
👉 “बोलो मां, शोर्गो तुमाय धनो, आश्चे बोरोश आबार आशबे तुमी।”
👉 “जॉय मां दुर्गे, फिरे आशबेन आबार।”
इन शब्दों में मां दुर्गा से अगले वर्ष पुनः आगमन का आग्रह होता है। यह भावपूर्ण विदाई केवल विदाई नहीं बल्कि आस्था और आशा का प्रतीक है।
विजय दशमी और सिंदूर खेला
विजय दशमी के दिन विसर्जन से पहले सुहागिन महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, जिसे सिंदूर खेला कहा जाता है। यह परंपरा मां दुर्गा की विदाई और घर-परिवार में सुख-समृद्धि की कामना का संकेत देती है।
विसर्जन यात्रा और पंचतत्व में विलय
भक्त ढोल-नगाड़ों और भक्ति गीतों के साथ प्रतिमा को विसर्जन स्थल तक लेकर जाते हैं। जयघोष “फिरे आशबेन आबार” या “अगले बरस तू जल्दी आ” के साथ मां दुर्गा की मूर्ति का जल में विसर्जन किया जाता है।
यह पंचतत्व में विलीन होकर सृष्टि में पुनः ऊर्जा के रूप में लौटने का दार्शनिक संदेश देता है।
ऐतिहासिक संदर्भ
-
कृत्तिवास रामायण (15वीं शताब्दी) और अन्य बंगाली साहित्य में दुर्गा पूजा और विसर्जन का उल्लेख मिलता है।
-
धर्म सिंधु और निर्णय सिंधु जैसे ग्रंथों में मिट्टी की प्रतिमा के विसर्जन की विधि का स्पष्ट वर्णन है।
🙏 मां दुर्गा की विदाई का यह अनुष्ठान हमें सिखाता है कि हर अंत एक नई शुरुआत है।
👉 क्या आप इस बार के विसर्जन में शामिल हुए? अपने अनुभव नीचे कमेंट में साझा करें।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
