- न्यूज मंत्रा लाइव टेक डेस्क
Deepfake Detection Device : आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के युग में जहां डीपफेक तकनीक ने दुनिया को चौकाया है, वहीं अब इस समस्या से निपटने के लिए ऑस्ट्रेलियाई रिसर्चर्स ने एक नया डिवाइस तैयार किया है।
मोनाश यूनिवर्सिटी (Monash University) ने ऑस्ट्रेलियन फेडरल पुलिस (AFP) के साथ मिलकर ऐसा उपकरण विकसित किया है जो एआई से बनाए गए फर्जी फोटो और वीडियो की पहचान कर सकेगा और उन्हें बनने से रोक सकेगा।
क्या है यह डिवाइस – ‘सिल्वरर’ (Silvrr)?
इस डिवाइस का नाम ‘सिल्वरर (Silvrr)’ रखा गया है। यह एक एआई-आधारित डिसरप्टर टूल है जो ‘डेटा पॉइजनिंग (Data Poisoning)’ तकनीक पर काम करता है।
इसमें किसी डिजिटल इमेज या वीडियो के पिक्सल्स में इतने सूक्ष्म परिवर्तन किए जाते हैं कि जब कोई अपराधी इनका उपयोग डीपफेक या फर्जी कंटेंट बनाने में करता है, तो एआई मॉडल गड़बड़ परिणाम (Distorted Output) देने लगता है।
यह तकनीक एआई मॉडल को “धोखा” देती है, जिससे वह असली और नकली का फर्क खुद पहचान नहीं पाता।
मोनाश यूनिवर्सिटी और एएफपी का संयुक्त प्रयास
यह डिवाइस AI for Law Enforcement and Community Safety (AILECS) लैब के तहत विकसित किया गया है। इस लैब में एआई, साइबर सिक्योरिटी और डिजिटल फोरेंसिक के विशेषज्ञ काम कर रहे हैं।
मोनाश यूनिवर्सिटी की पीएचडी शोधार्थी और परियोजना प्रमुख एलिजाबेथ पेरी (Elizabeth Perry) ने कहा:
“सिल्वरर डिवाइस से कोई भी व्यक्ति सोशल मीडिया पर फोटो अपलोड करने से पहले अपने इमेज को सुरक्षित बना सकता है यह पिक्सल्स में हल्का बदलाव कर देता है, जिससे एआई डीपफेक मॉडल उन फोटो को उपयोग नहीं कर पाते।”
कैसे करता है काम?
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इमेज अपलोड करें
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उपयोगकर्ता अपनी फोटो या वीडियो सिल्वरर पर अपलोड करता है।
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डेटा पॉइजनिंग लागू होती है
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सिस्टम फोटो के पिक्सल पैटर्न को इस तरह बदल देता है कि एआई उसे पढ़ नहीं सके।
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डीपफेक बनाना मुश्किल होता है
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बदले हुए डेटा से एआई-जेनरेटेड फेक फोटो/वीडियो धुंधले, गलत या पहचान में न आने योग्य हो जाते हैं।
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इस तकनीक के फायदे
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डीपफेक, फेक न्यूज और चाइल्ड एब्यूज कंटेंट को रोका जा सकेगा।
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अपराधियों के लिए एआई-आधारित गलत सामग्री बनाना कठिन होगा।
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आम लोग अपने डिजिटल डेटा को पहले से सुरक्षित बना सकेंगे।
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जांच एजेंसियों के लिए फर्जी कंटेंट की पहचान आसान होगी।
डीपफेक अपराध का बढ़ता खतरा
एएफपी (AFP) के डिजिटल फोरेंसिक विशेषज्ञ कैंपबेल विल्सन ने बताया कि एआई के आने के बाद से चाइल्ड अब्यूज और फेक कंटेंट के केस तेजी से बढ़े हैं। कई अपराधी ओपन-सोर्स एआई टूल्स की मदद से झूठी तस्वीरें और वीडियो बनाकर फैलाते हैं।
“सिल्वरर जैसे उपकरण इस साइबर अपराध को रोकने में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं।” — कैंपबेल विल्सन
आम लोगों के लिए भी मददगार होगा यह टूल
‘सिल्वरर’ सिर्फ जांच एजेंसियों के लिए नहीं बल्कि आम यूज़र्स के लिए भी उपयोगी बनाया जा रहा है, ताकि जो लोग सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरें डालते हैं, वे उन्हें AI सुरक्षा कवच (AI Shield) के साथ अपलोड कर सकें।
भविष्य की दिशा
यह प्रोटोटाइप फिलहाल परीक्षण चरण में है,
लेकिन रिसर्चर्स का मानना है कि आने वाले महीनों में
यह तकनीक आम यूज़र्स और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स के लिए भी उपलब्ध होगी।
“डीपफेक के दौर में डिजिटल डेटा को बचाने की दिशा में यह पहला वास्तविक कदम है।”
अगर आप डिजिटल दुनिया में अपनी पहचान को सुरक्षित रखना चाहते हैं,
तो ‘सिल्वरर’ जैसी एआई सुरक्षा तकनीकों के बारे में जानकारी फैलाएँ।
इस खबर को शेयर करें और बताएं —
“अब डीपफेक से लड़ने के लिए भी एआई तैयार है।”
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