- न्यूज मंत्रा लाइव हेल्थ डेस्क
Eco Anxiety : अब तक दुनिया जलवायु परिवर्तन को केवल तापमान में वृद्धि, ग्लेशियरों के पिघलने, और समुद्र स्तर बढ़ने जैसी भौतिक समस्याओं के रूप में समझती रही है। लेकिन द लांसेट काउंटडाउन की नई रिपोर्ट ने पहली बार वैज्ञानिक रूप से यह स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन का सीधा और गंभीर प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।
10 वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में 30–40% की बढ़ोतरी
लांसेट रिपोर्ट के अनुसार :
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क्लाइमेट ट्रिगर स्ट्रेस
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एंग्जाइटी
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डिप्रेशन
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पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD)
के मामलों में 30–40% वृद्धि दर्ज की गई है।
सबसे अधिक प्रभाव—
- एशिया
- अफ्रीका
- लैटिन अमेरिका
जैसे क्षेत्रों में देखा गया है, जहां आबादी जलवायु संकट के प्रति अधिक संवेदनशील है।
हीटवेव दिमाग के मूड-रिज़र्व सिस्टम को प्रभावित करती है
लंबे समय तक 35°C से ऊपर के तापमान में रहने से:
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मानसिक थकान
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चिड़चिड़ापन
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एकाग्रता में कमी
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आक्रामकता
तेजी से बढ़ती है।
लांसेट आंकड़ों के मुताबिक—
35°C से ऊपर के दिनों में दुनियाभर में मेंटल हेल्थ इमरजेंसी केसेस 8–12% तक बढ़ जाते हैं।
भारत में गर्मी के महीनों में यह प्रभाव और भी अधिक तीव्र होता है।
बाढ़, जंगलों की आग और तूफान — PTSD का बड़ा कारण
चरम मौसम घटनाओं जैसे:
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बाढ़
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सूखा
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जंगलों में आग
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चक्रवात
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भूस्खलन
का सामना करने वाले 45% लोगों में PTSD के लक्षण पाए गए। यह संख्या युद्धभूमि से लौटने वाले सैनिकों के बराबर बताई गई है। प्राकृतिक आपदाएं न सिर्फ घर और जीवन छीनती हैं, बल्कि मानसिक रूप से गहरा आघात छोड़ जाती हैं।
युवाओं में तेजी से बढ़ रहा इको-एंग्जाइटी
इको-एंग्जाइटी भविष्य के जलवायु संकट को लेकर पैदा होने वाला डर और असुरक्षा है। रिपोर्ट के अनुसार, 16–25 वर्ष के बीच:
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59% युवाओं को लगता है कि भविष्य सुरक्षित नहीं है
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45% युवाओं को लगता है कि वे बच्चों को जन्म देने में डरते हैं
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अधिकांश युवा अनिद्रा, क्रॉनिक स्ट्रेस और डिप्रेशन का अनुभव कर रहे हैं
यानी जलवायु परिवर्तन अब युवा पीढ़ी के मानसिक ढांचे और जीवन निर्णयों को भी प्रभावित कर रहा है।
आर्थिक अस्थिरता भी बढ़ा रही मानसिक संकट
कई देशों में—
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फसलें बर्बाद
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नदी सूख गई
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जंगल कट गए
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आजीविका खत्म
होने से ग्रामीण और कृषक समुदाय क्लाइमेट इंड्यूज्ड स्ट्रेस का सामना कर रहे हैं। एक बड़े अध्ययन में पाया गया कि—
जलवायु अस्थिरता से प्रभावित इलाकों में आत्महत्या दर 5–10% तक बढ़ी है।
भारत के—
- महाराष्ट्र
- कर्नाटक
- तमिलनाडु
जैसे राज्यों में किसान आत्महत्याओं के पीछे मौसम की अनिश्चितता एक बड़ा कारण बन चुकी है।
वार्ता अब सिर्फ कार्बन उत्सर्जन की नहीं, मानसिक स्वास्थ्य की भी होनी चाहिए
आज दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन पर चर्चाएं—
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कार्बन उत्सर्जन
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ऊर्जा नीति
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ग्लोबल वार्मिंग
तक सीमित हैं। लेकिन अब यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन मनुष्य के मन पर भी भारी बोझ डाल रहा है।
इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि—
“क्लाइमेट पॉलिसी अब मानसिक स्वास्थ्य पॉलिसी का भी हिस्सा होनी चाहिए।”
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