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- ओस्लो | इंटरनेशनल डेस्क
Quick View
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ऐतिहासिक बदलाव: नॉर्वे के सरकारी आयोग ने परमाणु ऊर्जा पर विचार करने की सिफारिश वाली रिपोर्ट सौंपी।
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ऊर्जा संकट: भविष्य में बिजली की बढ़ती मांग और हाइड्रोपावर की सीमाओं को देखते हुए लिया गया फैसला।
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पड़ोसियों का असर: स्वीडन और फिनलैंड की परमाणु नीतियों से प्रेरित है नॉर्वे का यह कदम।
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SMR तकनीक: बड़े प्लांट के बजाय छोटे और सुरक्षित स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स पर ध्यान।
Norway, Energy Policy : दशकों तक परमाणु ऊर्जा का कड़ा विरोध करने के बाद नॉर्वे अब एक बड़े ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) की दहलीज पर खड़ा है। 8 अप्रैल 2026 को नॉर्वे के एक सरकारी आयोग ने सरकार को एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सौंपी है, जिसमें देश में परमाणु ऊर्जा, विशेष रूप से स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) के निर्माण और संचालन पर गंभीरता से विचार करने की वकालत की गई है। यह कदम नॉर्वे की उस पारंपरिक ऊर्जा नीति में आमूल-चूल बदलाव का संकेत है, जो अब तक लगभग पूरी तरह से जलविद्युत (Hydropower) पर निर्भर रही है।
हाइड्रोपावर की सीमाएं और भविष्य की चुनौती
नॉर्वे वर्तमान में अपनी कुल बिजली का लगभग 88% हिस्सा जलविद्युत से प्राप्त करता है। हालांकि, भारी उद्योग के विद्युतीकरण और डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग के कारण, आयोग का मानना है कि केवल हाइड्रोपावर और पवन ऊर्जा भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं होगी। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ‘बेस लोड’ बिजली के रूप में परमाणु ऊर्जा एक स्थिर विकल्प हो सकता है।
स्वीडन और फिनलैंड की राह पर नॉर्वे
नॉर्वे का यह फैसला उसके पड़ोसी देशों, स्वीडन और फिनलैंड की सफल परमाणु नीतियों से प्रभावित है। फिनलैंड ने हाल ही में अपने नए परमाणु संयंत्रों के माध्यम से ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल की है, जबकि स्वीडन ने नए रिएक्टर्स बनाने के लिए अपने कानूनों में बदलाव किए हैं। नॉर्वे अब इसी नॉर्डिक मॉडल को अपनाकर जीवाश्म मुक्त ऊर्जा की ओर कदम बढ़ाना चाहता है।
स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs) पर जोर
आयोग ने पारंपरिक बड़े परमाणु संयंत्रों के बजाय SMR तकनीक को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया है। ये आकार में छोटे होते हैं, इन्हें कारखानों में निर्मित किया जा सकता है और ये मौजूदा ग्रिड के साथ आसानी से जुड़ सकते हैं। इनके सुरक्षा मानक भी पारंपरिक रिएक्टर्स की तुलना में अधिक उन्नत माने जाते हैं।
“ऊर्जा परिदृश्य तेजी से बदल रहा है। यदि हमें अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करना है और उद्योग के लिए प्रतिस्पर्धी बिजली की कीमतें सुनिश्चित करनी हैं, तो हम परमाणु ऊर्जा जैसे कार्बन-मुक्त विकल्पों को चर्चा से बाहर नहीं रख सकते।” — रिपोर्ट सौंपने के दौरान आयोग के एक वरिष्ठ सदस्य का वक्तव्य।
Facts
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वर्तमान स्थिति: नॉर्वे में फिलहाल कोई भी व्यावसायिक परमाणु बिजली संयंत्र नहीं है।
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रिसर्च इतिहास: नॉर्वे ने पहले केवल अनुसंधान (Research) के लिए छोटे रिएक्टर्स का उपयोग किया था, जिन्हें अब बंद किया जा चुका है।
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बिजली मिश्रण: नॉर्वे की ग्रिड में हाइड्रोपावर के बाद पवन ऊर्जा (Wind Energy) का दूसरा सबसे बड़ा योगदान है।
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SMR लाभ: ये पारंपरिक संयंत्रों की तुलना में कम जगह घेरते हैं और इनका निर्माण समय भी कम होता है।
Timelines
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1970-80 के दशक: नॉर्वे में परमाणु ऊर्जा के खिलाफ मजबूत जन आंदोलन और नीतिगत विरोध।
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2023: सरकार द्वारा परमाणु ऊर्जा की क्षमता का आकलन करने के लिए एक विशेष आयोग का गठन।
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8 अप्रैल 2026: आयोग ने औपचारिक रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें न्यूक्लियर ऊर्जा को ‘ग्रीन सिग्नल’ दिया गया।
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2026 के अंत तक: सरकार द्वारा रिपोर्ट पर संसद (Stortinget) में बहस और भविष्य की रूपरेखा तैयार करने की संभावना।
नॉर्वे का यह ‘न्यूक्लियर यू-टर्न’ वैश्विक ऊर्जा राजनीति में एक बड़ा संदेश है। अगले कदम के रूप में, नॉर्वे की सरकार को अब परमाणु ऊर्जा के लिए कानूनी ढांचा तैयार करना होगा और सुरक्षा मानकों पर जनता का विश्वास जीतना होगा। यदि यह योजना सफल होती है, तो नॉर्वे न केवल अपनी घरेलू मांग पूरी करेगा, बल्कि यूरोप के लिए एक प्रमुख ‘ग्रीन एनर्जी हब’ के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर लेगा।
क्या आपको लगता है कि भारत को भी नॉर्वे की तरह छोटे परमाणु रिएक्टर्स (SMRs) पर अधिक निवेश करना चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट्स में बताएं।
Disclaimer : यह लेख उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और आयोग के सुझावों पर आधारित है। परमाणु संयंत्रों की स्थापना एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है जो भविष्य के विधायी निर्णयों के अधीन है।
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