- इंटरनेशनल डेस्क
अमेरिका के केंद्रीय बैंक Federal Reserve (Fed) की मौद्रिक नीति बैठक केवल अमेरिका तक सीमित घटना नहीं होती। इस बैठक में लिया गया ब्याज दर का फैसला दुनिया के शेयर बाजारों, डॉलर, सोना, कच्चे तेल, बॉन्ड मार्केट और उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर सीधा असर डालता है।
जुलाई 2026 की Federal Open Market Committee (FOMC) बैठक में फेड ने अपनी प्रमुख ब्याज दर 3.50% से 3.75% के दायरे में स्थिर रखने का फैसला किया। हालांकि यह फैसला सर्वसम्मति से नहीं हुआ और तीन अधिकारियों ने दर बढ़ाने की वकालत की।
Federal Reserve अमेरिका का केंद्रीय बैंक है।
इसकी स्थापना 1913 में हुई थी। इसका प्रमुख उद्देश्य है—
- महंगाई को नियंत्रित रखना
- रोजगार को स्थिर रखना
- वित्तीय प्रणाली को मजबूत बनाना
Fed की ब्याज दरें दुनिया की सबसे प्रभावशाली नीतिगत दरों में मानी जाती हैं।
क्या हुआ इस बार?
फेड ने लगातार आर्थिक आंकड़ों, रोजगार और महंगाई का आकलन करने के बाद फिलहाल ब्याज दरें स्थिर रखने का फैसला लिया।
हालांकि तीन क्षेत्रीय फेड अधिकारियों ने 0.25 प्रतिशत दर बढ़ाने के पक्ष में मतदान किया। इससे यह संकेत मिला कि समिति के भीतर महंगाई को लेकर मतभेद बने हुए हैं।
- जून 2026: पिछली बैठक में भी दरें स्थिर रहीं।
- 28-29 जुलाई 2026: दो दिवसीय FOMC बैठक।
- 29 जुलाई 2026: ब्याज दरें यथावत रखने की घोषणा।
- सितंबर 2026: अगली बैठक में नए आर्थिक आंकड़ों के आधार पर निर्णय संभव।
Fed का फैसला पूरी दुनिया पर असर डाल सकता है।
शेयर बाजार
वैश्विक इक्विटी बाजारों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है।
डॉलर
डॉलर मजबूत या कमजोर होने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित होता है।
सोना
ब्याज दरों की दिशा के अनुसार सोने की कीमतों में बदलाव संभव है।
बॉन्ड मार्केट
अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड निवेशकों की रणनीति बदल सकती है।
Fed का फैसला भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है।
- विदेशी निवेश (FPI) का रुख बदल सकता है।
- रुपया-डॉलर विनिमय दर प्रभावित हो सकती है।
- RBI की भविष्य की मौद्रिक नीति पर अप्रत्यक्ष असर पड़ सकता है।
- भारतीय शेयर बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है।
- आयातित महंगाई पर प्रभाव पड़ सकता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि फेड अभी “Wait and Watch” रणनीति अपना रहा है।
यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक बनी रहती है तो सितंबर या उसके बाद ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
पिछले कुछ वर्षों में वैश्विक महंगाई, ऊर्जा कीमतों, भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई चेन चुनौतियों ने केंद्रीय बैंकों के लिए ब्याज दर तय करना कठिन बना दिया है।
Fed लगातार महंगाई को 2% के लक्ष्य तक लाने का प्रयास कर रहा है।
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