AI-G/NML
- एडिटोरियल डेस्क
Uproar versus dialogue in Parliament: भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद केवल कानून बनाने की जगह नहीं, बल्कि सरकार से सवाल पूछने, नीतियों की समीक्षा करने और जनता की आवाज को राष्ट्रीय विमर्श तक पहुंचाने का सर्वोच्च मंच है। लेकिन 13 अगस्त 2026 को समाप्त हुआ मानसून सत्र एक बार फिर संसद के कामकाज को लेकर गंभीर सवाल छोड़ गया है।
PRS Legislative Research के अनुसार 20 जुलाई से 13 अगस्त तक चले 19-दिवसीय सत्र में दोनों सदनों में बार-बार व्यवधान हुआ। लोकसभा में प्रश्नकाल निर्धारित समय का केवल 1% और राज्यसभा में 12% ही चल सका। कई विधेयक ऐसे समय पारित हुए जब पर्याप्त चर्चा नहीं हो सकी।
दूसरी ओर, सरकार का पक्ष है कि विपक्ष के लगातार विरोध और व्यवधान के बावजूद विधायी कामकाज आगे बढ़ाया गया। सरकार के अनुसार सत्र में महत्वपूर्ण विधेयकों पर काम हुआ और कई कानून पारित किए गए।
यही विरोधाभास आज के संपादकीय का मूल प्रश्न है—क्या संसद में विधायी काम पूरा करना पर्याप्त है, या कानून की गुणवत्ता के लिए पर्याप्त बहस भी उतनी ही जरूरी है?
Analysis
संसदीय लोकतंत्र में संख्या महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल संख्या लोकतंत्र की पूरी तस्वीर नहीं है। किसी विधेयक का पारित हो जाना और उस पर पर्याप्त संसदीय विमर्श होना—दो अलग बातें हैं।
प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। यदि प्रश्नकाल लगातार बाधित होता है तो सांसदों को सरकार से सीधे सवाल पूछने और संबंधित मंत्री से स्पष्टीकरण लेने का अवसर कम हो जाता है। इसका असर अंततः जनता के अधिकार पर पड़ता है।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विपक्ष के पास सरकार की नीतियों के विरोध और गंभीर मुद्दों को उठाने के लिए सीमित संसदीय औजार हैं। यदि उसे लगता है कि किसी मुद्दे पर पर्याप्त चर्चा नहीं हो रही, तो विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है। समस्या तब पैदा होती है जब विरोध का तरीका ही चर्चा की संभावना को समाप्त कर दे।
इसी तरह सरकार को भी यह समझना होगा कि बहुमत कानून पारित करने की संवैधानिक शक्ति देता है, लेकिन व्यापक चर्चा से कानून की गुणवत्ता, स्वीकार्यता और भविष्य की व्यावहारिकता मजबूत होती है।
इस सत्र में FCRA संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति को भेजना इसका एक उदाहरण है। इससे पता चलता है कि विवादित कानूनों पर अतिरिक्त संसदीय जांच और विचार-विमर्श की गुंजाइश लोकतंत्र के लिए उपयोगी हो सकती है।
Different Views
सरकार का दृष्टिकोण
सरकार के समर्थकों का तर्क है कि जनता ने सरकार को शासन करने और कानून बनाने का जनादेश दिया है। लगातार हंगामा करके विधायी काम रोकना जनता के जनादेश का अपमान है। यदि विपक्ष के पास आपत्तियां हैं तो उसे सदन में बहस के दौरान अपने तर्क रखने चाहिए।
विपक्ष का दृष्टिकोण
विपक्ष का कहना है कि संसद में केवल विधेयक पारित करना पर्याप्त नहीं है। सरकार को संवेदनशील और विवादित मुद्दों पर जवाब देना चाहिए तथा विपक्ष को पर्याप्त चर्चा का अवसर मिलना चाहिए। विपक्ष ने इस सत्र के दौरान कई मुद्दों पर सरकार पर चर्चा से बचने का आरोप लगाया।
जनता का दृष्टिकोण
जनता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल इससे भी सरल है—संसद कितनी प्रभावी ढंग से काम कर रही है?
करदाता यह जानना चाहता है कि उसके प्रतिनिधि रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, कृषि और आर्थिक विकास जैसे मुद्दों पर कितनी गंभीरता से चर्चा कर रहे हैं।
Challenges
सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक टकराव को संसदीय संवाद में बदलना है।
दूसरी चुनौती यह है कि विरोध और व्यवधान के बीच स्पष्ट सीमा तय की जाए। शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की ताकत है, लेकिन लगातार सदन की कार्यवाही रोक देना संसदीय संस्थाओं को कमजोर कर सकता है।
तीसरी चुनौती विधेयकों की गुणवत्ता से जुड़ी है। कम समय में कानून बनाना कई बार जरूरी हो सकता है, लेकिन जटिल आर्थिक, सामाजिक और संवैधानिक कानूनों पर विशेषज्ञों, समितियों और हितधारकों की राय लेना दीर्घकाल में अधिक उपयोगी हो सकता है।
चौथी चुनौती जनता के विश्वास की है। यदि संसद लगातार टकराव का दृश्य बनती रही तो नागरिकों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति निराशा पैदा हो सकती है।
Possible Solutions
पहला—न्यूनतम संसदीय संवाद पर सहमति।
सरकार और विपक्ष को तय करना चाहिए कि गंभीर राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यवधान के बजाय निर्धारित समय में अनिवार्य चर्चा होगी।
दूसरा—प्रश्नकाल की सुरक्षा।
प्रश्नकाल को राजनीतिक विरोध से यथासंभव अलग रखने के लिए सर्वदलीय सहमति विकसित की जा सकती है।
तीसरा—विवादित विधेयकों को समितियों के पास भेजना।
जहां कानून का व्यापक सामाजिक या आर्थिक प्रभाव हो, वहां स्थायी समिति या संयुक्त संसदीय समिति की जांच को प्राथमिकता दी जा सकती है।
चौथा—सदन के समय की जवाबदेही।
व्यवधान के कारण खोए संसदीय समय का सार्वजनिक रिकॉर्ड और उसका नियमित विश्लेषण होना चाहिए।
पांचवां—सर्वदलीय बैठकें अधिक प्रभावी हों।
सत्र शुरू होने से पहले ही सरकार और विपक्ष संवेदनशील मुद्दों तथा चर्चा के समय पर सहमति बना सकते हैं।
छठा—जनता को स्पष्ट रिपोर्ट मिले।
हर सत्र के अंत में सरकार और विपक्ष दोनों को यह बताना चाहिए कि कितने घंटे चर्चा हुई, कितने प्रश्न पूछे गए, कितने विधेयकों पर समिति की जांच हुई और कितना समय व्यवधान में गया।
Conclusion
संसद लोकतंत्र का अखाड़ा नहीं, लोकतंत्र का संवाद-स्थल है।
सरकार को बहुमत का सम्मान करते हुए विपक्ष की आवाज सुननी चाहिए और विपक्ष को अपनी असहमति दर्ज कराने के साथ-साथ सदन चलाने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए।
लोकतंत्र में सहमति जरूरी नहीं, लेकिन संवाद जरूरी है।
सरकार की जवाबदेही और विपक्ष का विरोध—दोनों लोकतंत्र के आवश्यक हिस्से हैं। मगर जब विरोध इतना बढ़ जाए कि सवाल पूछने का मंच ही बंद हो जाए, या बहुमत इतना प्रभावी हो जाए कि गंभीर बहस की आवश्यकता ही महसूस न हो, दोनों स्थितियां लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं हैं।
भारत को ऐसी संसद चाहिए जहां सरकार कानून बनाए, विपक्ष सवाल पूछे, समितियां जांच करें और जनता को भरोसा हो कि उसके प्रतिनिधि उसके हितों पर गंभीरता से बहस कर रहे हैं।
संसद की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने विधेयक पारित हुए; यह भी देखा जाना चाहिए कि वे कितनी गंभीर बहस, जवाबदेही और लोकतांत्रिक विमर्श के बाद पारित हुए।
Disclaimer
यह संपादकीय उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों और संसदीय कामकाज से जुड़े आंकड़ों के आधार पर संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें व्यक्त विचार संपादकीय विश्लेषण हैं, किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में आधिकारिक वक्तव्य नहीं। संसद के कामकाज और राजनीतिक पक्षों से जुड़े आंकड़ों में स्रोतों के अनुसार अंतर संभव है; इसलिए पाठकों को मूल संसदीय रिकॉर्ड और आधिकारिक दस्तावेजों को प्राथमिक स्रोत मानना चाहिए।
Discover more from
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
