- डेस्क टीम
EVM Totaliser: चुनाव में मतदाता का वोट केवल डाला जाना ही महत्वपूर्ण नहीं है; यह भी महत्वपूर्ण है कि उसकी राजनीतिक पसंद की पहचान अनावश्यक रूप से न हो।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से EVM में Totaliser के इस्तेमाल के प्रस्ताव पर विचार करने को कहा है। Totaliser अलग-अलग मतदान केंद्रों की EVM से मिले वोटों को मिलाकर aggregate result देने की व्यवस्था है, जिससे किसी एक polling station का candidate-wise voting pattern सीधे सामने नहीं आता।
यहीं से आज का बड़ा सवाल पैदा होता है:
चुनाव की पारदर्शिता और मतदाता की गोपनीयता—क्या दोनों को एक साथ और मजबूत किया जा सकता है?
1. आखिर मामला क्या है?
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा है कि क्या Totaliser mechanism के जरिए अलग-अलग EVMs के votes को मिलाकर गिनना संभव है।
मौजूदा ECI जानकारी के अनुसार Totaliser का prototype एक साथ 14 Control Units तक के votes aggregate कर सकता है, जिससे किसी विशेष polling station का candidate-wise result अलग से सामने नहीं आता। हालांकि यह व्यवस्था अभी नियमित रूप से इस्तेमाल में नहीं है।
इसका उद्देश्य चुनाव परिणाम बदलना नहीं, बल्कि मतदान पैटर्न की granular visibility को कम करना है।
2. Totaliser क्यों महत्वपूर्ण है?
कल्पना कीजिए कि किसी इलाके के एक छोटे polling station में किसी उम्मीदवार को बहुत ज्यादा वोट मिले।
यदि polling-station-level data उपलब्ध है, तो राजनीतिक दल या उम्मीदवार उस क्षेत्र के मतदान व्यवहार का काफी सूक्ष्म अनुमान लगा सकते हैं।
Totaliser का विचार यह है कि:
Polling Station A + B + C + D… → Combined Count
इससे individual booth का candidate-wise pattern छिपा रहता है।
यानी बहस सिर्फ EVM की तकनीक पर नहीं है।
यह मतदाता की राजनीतिक पसंद की privacy पर भी है।
3. लेकिन पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है
यहां एक महत्वपूर्ण संतुलन है।
चुनाव में transparency इसलिए जरूरी है क्योंकि मतदाता और राजनीतिक दलों को यह भरोसा होना चाहिए कि:
- कितने वोट पड़े?
- कितने वोट गिने गए?
- EVM की integrity सुरक्षित रही या नहीं?
- परिणाम कैसे निकला?
- उम्मीदवारों और counting agents को verification का अवसर मिला या नहीं?
Election Commission के अनुसार EVM counting प्रक्रिया में Control Unit के votes को Form 17C से tally किया जाता है और counting candidates/counting agents की मौजूदगी में होती है।
इसलिए मतदाता की privacy बढ़ाने के नाम पर ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए जिससे चुनावी audit कमजोर हो।
4. असली लोकतांत्रिक सवाल
यह बहस अक्सर गलत जगह चली जाती है।
सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए:
“EVM सही है या गलत?”
बल्कि इससे आगे के सवाल भी होने चाहिए:
क्या मतदाता की पसंद सुरक्षित है?
क्या चुनावी प्रक्रिया independently verifiable है?
क्या transparency और privacy का संतुलन बनाया जा सकता है?
क्या राजनीतिक दलों को पर्याप्त audit information मिलती रहेगी?
क्या चुनावी डेटा इतना granular होना जरूरी है कि किसी इलाके की राजनीतिक पसंद आसानी से map की जा सके?
यही वह जगह है जहां तकनीकी चुनावी बहस नागरिक अधिकार की बहस बन जाती है।
दो अलग-अलग दृष्टिकोण
दृष्टिकोण 1: अधिक privacy
Totaliser के समर्थक कह सकते हैं कि मतदाता को यह डर नहीं होना चाहिए कि उसके polling station का सामूहिक voting pattern बाद में राजनीतिक दबाव, सामाजिक तनाव या targeted retaliation का कारण बन सकता है।
इस दृष्टिकोण में:
Secret Ballot → Stronger Privacy → Greater Electoral Freedom
मुख्य विचार है।
दृष्टिकोण 2: अधिक granular transparency
दूसरी तरफ यह तर्क भी महत्वपूर्ण है कि चुनावी प्रक्रिया में data transparency कम नहीं होनी चाहिए।
राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को counting process पर पर्याप्त भरोसा और verification mechanism चाहिए।
इसलिए:
Privacy बढ़े, लेकिन Auditability कमजोर न हो।
यही सबसे महत्वपूर्ण institutional test होगा।
EVM विवाद से इसे अलग समझना जरूरी
एक और editorial सावधानी जरूरी है।
Totaliser पर बहस को अपने-आप EVM में गड़बड़ी के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करना गलत होगा।
Election Commission की मौजूदा जानकारी EVM counting, Form 17C और VVPAT से संबंधित safeguards का विवरण देती है।
Totaliser की बहस का केंद्रीय मुद्दा अलग है:
क्या polling-station-level voting pattern को aggregate किया जाना चाहिए ताकि मतदाता की राजनीतिक पसंद की privacy और मजबूत हो?
समाज के लिए इसका महत्व
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ पांच साल में एक दिन होने वाली प्रक्रिया नहीं हैं।
चुनाव के दौरान नागरिक अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करता है।
लेकिन लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह भी है कि व्यक्ति को अपनी राजनीतिक पसंद के कारण सामाजिक या राजनीतिक दबाव का सामना न करना पड़े।
इसलिए Secret Ballot का अर्थ केवल यह नहीं कि किसी व्यक्ति ने किस उम्मीदवार के सामने बटन दबाया, यह दिखाई न दे।
इसके व्यापक अर्थ में यह भी महत्वपूर्ण है कि चुनावी व्यवस्था किसी व्यक्ति या छोटे समूह की राजनीतिक पसंद को अनावश्यक रूप से expose न करे।
What Next?
अब तीन चीजें महत्वपूर्ण होंगी:
- केंद्र सरकार का जवाब क्या आता है।
- Totaliser लागू होने पर audit और transparency कैसे कायम रखी जाएगी।
- Election Commission और राजनीतिक दल इस व्यवस्था को किस तरह देखते हैं।
इस बहस का परिणाम चाहे जो हो, चुनावी सुधार का लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए:
मतदाता का भरोसा बढ़े, राजनीतिक गोपनीयता सुरक्षित रहे और परिणाम की विश्वसनीयता भी पूरी तरह audit की जा सके।
आज का Editorial Take
भारत की चुनावी बहस को “EVM बनाम Ballot” या “सिस्टम सही बनाम सिस्टम गलत” जैसी दो ध्रुवीय बहसों में सीमित करना पर्याप्त नहीं है।
अगली पीढ़ी के चुनाव सुधार का सवाल ज्यादा सूक्ष्म है।
हमें ऐसी चुनावी व्यवस्था चाहिए जिसमें:
मतदाता की पसंद सुरक्षित हो,
गिनती पारदर्शी हो,
audit संभव हो,
राजनीतिक दलों का विश्वास बना रहे
और नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी राजनीतिक पसंद उसके खिलाफ इस्तेमाल नहीं होगी।
Totaliser पर सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा पहल इसी बड़े प्रश्न की ओर ध्यान खींचती है।
आज का असली नजरिया: चुनाव की विश्वसनीयता केवल वोट सही गिनने से नहीं बनती—वोटर को सुरक्षित महसूस कराने से भी बनती है।
आज के लिए यही बेहतर “नजरिया” है—खबर से आगे जाकर लोकतंत्र में मतदाता की privacy और चुनावी transparency के बीच संतुलन पर सवाल उठाना।
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