- एडिटोरियल डेस्क
Procurement Policy : सरकारी खरीद में अक्सर चर्चा कीमत, टेंडर और नियमों के इर्द-गिर्द होती है। लेकिन किसी procurement की असली सफलता का सवाल इससे कहीं आगे है—जिस वस्तु, सेवा या परियोजना की जरूरत है, वह वास्तव में कब और कहां उपलब्ध हुई?
यही वह बिंदु है जिसे हम “arrival reality” कह सकते हैं।
किसी विभाग को अस्पताल के लिए उपकरण चाहिए, स्कूल को फर्नीचर चाहिए, किसी परियोजना को मशीनरी चाहिए या किसी सार्वजनिक सेवा को डिजिटल समाधान की जरूरत है। यदि खरीद प्रक्रिया नियमों के अनुसार पूरी हो जाए, कीमत उचित हो और कागज पर contract भी सफल दिखे, लेकिन जरूरी सामान जरूरत के समय उपलब्ध ही न हो, तो procurement की वास्तविक उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भारत का मौजूदा procurement framework इस समस्या को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं करता। Department of Expenditure के 2024 के Goods Procurement Manual में contract management के तहत time control, delivery, logistics, receiving और supplier performance को अलग-अलग महत्वपूर्ण हिस्सों के रूप में रखा गया है।
सवाल इसलिए नियमों की अनुपस्थिति का कम और उनके implementation को वास्तविक operational जरूरत से जोड़ने का अधिक है।
खरीद पूरी होना और जरूरत पूरी होना एक ही बात नहीं
Procurement को केवल “order placed” या “contract awarded” तक देखना अधूरा दृष्टिकोण है।
वास्तविक परिणाम की श्रृंखला कुछ ऐसी होनी चाहिए:
Need identified → Procurement planned → Supplier selected → Contract awarded → Delivery → Inspection/Acceptance → Installation/Use → Desired outcome
यदि इस श्रृंखला में delivery या उपयोग के स्तर पर बड़ी देरी हो जाती है, तो शुरुआती procedural efficiency अपने आप में पर्याप्त नहीं रहती।
सरकारी procurement guidance भी इसी दिशा में है। 2024 के Goods Procurement Manual में contract management का उद्देश्य केवल contract की शर्तों का पालन कराना नहीं, बल्कि contractor से desired outcomes हासिल करना बताया गया है। इसमें timely deliveries और problems की timely resolution भी शामिल हैं।
इसका अर्थ साफ है: procurement की अंतिम कसौटी केवल खरीद का होना नहीं, जरूरत का पूरा होना होना चाहिए।
“Right Time” को सिर्फ Tender Date से नहीं मापना चाहिए
Department of Commerce के procurement manual में “Right Time and Place” को procurement के मूल principles में शामिल किया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि जरूरत से बहुत पहले या बहुत देर से procurement करना लागत और logistics दोनों को प्रभावित कर सकता है; अवास्तविक completion schedule delays, claims और disputes पैदा कर सकता है।
यहीं से policy के लिए एक महत्वपूर्ण सवाल निकलता है:
क्या procurement planning उस तारीख को केंद्र में रखती है जब वस्तु की जरूरत है, या केवल उस तारीख को जब tender प्रक्रिया पूरी करनी है?
दोनों में अंतर छोटा दिखाई दे सकता है, लेकिन सार्वजनिक सेवा में इसका असर बड़ा हो सकता है।
GeM ने प्रक्रिया को डिजिटल किया, अब responsiveness अगला सवाल है
Government e-Marketplace ने public procurement को digital, paperless और अधिक transparent बनाने की दिशा में बड़ा ढांचा तैयार किया है। सरकारी विवरण के अनुसार GeM procurement lifecycle को seller registration और listing से लेकर bidding, contract award, order fulfilment और payment तक डिजिटल रूप से support करता है।
लेकिन digital procurement अपने आप में responsive procurement की गारंटी नहीं है।
यदि system में उपलब्ध विकल्पों में से कोई supplier निर्धारित quality और specification तो पूरा करता है, लेकिन वास्तविक operational requirement के समय तक delivery नहीं कर सकता, तो केवल lowest price पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा।
GFR framework में भी GeM procurement के संदर्भ में quality, specification और delivery period को चयन के महत्वपूर्ण मानदंडों के रूप में रखा गया है।
इसलिए अगला policy question यह होना चाहिए:
क्या procurement systems को price + quality के साथ “time-to-use” को भी अधिक स्पष्ट operational metric बनाना चाहिए?
Arrival Reality का मतलब क्या हो सकता है?
एक responsive procurement framework में “arrival” को सिर्फ माल के परिसर में पहुंचने के रूप में नहीं देखना चाहिए।
व्यावहारिक रूप से इसे तीन स्तरों पर देखा जा सकता है:
1. Physical Arrival
सामान वास्तव में निर्धारित स्थान तक कब पहुंचा?
2. Usable Arrival
Inspection, installation, testing या commissioning के बाद वह कब उपयोग के योग्य हुआ?
3. Outcome Arrival
जिस सार्वजनिक जरूरत के लिए खरीद की गई थी, उसका वास्तविक समाधान कब शुरू हुआ?
उदाहरण के लिए, किसी अस्पताल में मशीन पहुंच जाना और उसका मरीजों के लिए operational हो जाना दो अलग घटनाएं हो सकती हैं।
इसी तरह किसी infrastructure project में equipment site पर पहुंच जाना और project को operational benefit मिलना एक ही तारीख नहीं हो सकती।
इस अंतर को procurement dashboards और contract monitoring में अधिक स्पष्ट रूप से दिखाया जा सकता है।
Policy को Supplier की क्षमता के साथ भी बदलना होगा
Arrival reality केवल buyer की समस्या नहीं है।
Supply chain disruptions, manufacturing capacity, transportation, import dependence, seasonal demand और supplier concentration जैसी परिस्थितियां delivery को प्रभावित कर सकती हैं।
2024 के Goods Procurement Manual में contract management के अंतर्गत delivery delays की monitoring, logistics, receiving और supplier performance जैसे अलग-अलग हिस्से रखे गए हैं।
इससे एक उपयोगी policy principle निकलता है:
Procurement policy को केवल supplier चुनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए; supplier की वास्तविक delivery capability को contract lifecycle में लगातार track करना चाहिए।
“Cheapest” हमेशा “Best Value” नहीं
सरकारी procurement में सार्वजनिक धन का कुशल उपयोग जरूरी है। लेकिन procurement manual स्वयं केवल सबसे कम कीमत को पर्याप्त मानने के बजाय quality, quantity, operational costs और life-cycle costs को ध्यान में रखने की बात करता है।
इसलिए यदि कोई विकल्प थोड़ा महंगा है लेकिन:
- समय पर उपलब्ध होता है,
- installation जल्दी पूरा करता है,
- maintenance कम मांगता है,
- supply risk कम करता है,
- और जल्दी public service शुरू कर देता है,
तो उसका मूल्यांकन केवल purchase price से करना अधूरा हो सकता है।
यह किसी खास procurement में किसी supplier को चुनने की सलाह नहीं, बल्कि value-for-money की व्यापक परिभाषा की बात है।
Responsive Procurement के लिए पांच बदलाव
भारत में procurement policy को arrival reality के प्रति अधिक responsive बनाने पर विचार करते समय कम-से-कम पांच operational metrics उपयोगी हो सकते हैं:
पहला — Need-to-Use Time
Requirement identify होने से actual usable delivery तक कुल समय।
दूसरा — Delivery Reliability
Supplier द्वारा promised और actual delivery के बीच अंतर।
तीसरा — Time-to-Commission
सामान पहुंचने के बाद उसे operational बनाने में लगा समय।
चौथा — Delay Reason Coding
Delay buyer, supplier, logistics, approval, inspection या किसी external disruption के कारण हुआ—इसे structured तरीके से दर्ज करना।
पांचवां — Outcome Tracking
Contract पूरा होने के बाद वास्तविक public-service outcome क्या मिला?
इससे procurement data केवल “कितने रुपये की खरीद हुई” तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि “उस खरीद से सेवा कब शुरू हुई” जैसे सवालों का भी जवाब देगा।
MSME के लिए संतुलन जरूरी
Responsive procurement का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि छोटे suppliers केवल इसलिए बाहर हो जाएं क्योंकि वे बड़े suppliers जैसी inventory या logistics capacity नहीं रखते।
Public Procurement Policy पहले से ही MSE participation को policy objective के रूप में मान्यता देती है। Department of MSME के अनुसार Central Ministries, Departments और PSUs के लिए MSE procurement policy लागू है और इसमें procurement targets तथा monitoring mechanisms भी हैं।
इसलिए delivery responsiveness बढ़ाने की किसी नई व्यवस्था को competition, inclusion और MSME participation के साथ संतुलित करना होगा।
असली सुधार “तेज खरीद” नहीं, “सही समय पर सही परिणाम” है
Procurement को तेज करना अपने आप में पर्याप्त लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
कभी तेज tendering जरूरी होगी। कभी detailed specification जरूरी होगी। कभी local sourcing उपयोगी हो सकती है। कभी multiple suppliers रखना supply risk कम कर सकता है। और कभी procurement को थोड़ा पहले शुरू करना ही सबसे व्यावहारिक समाधान हो सकता है।
इसलिए बेहतर प्रश्न यह नहीं है:
“Tender कितनी जल्दी पूरा हुआ?”
बल्कि:
“जिस जरूरत के लिए public money खर्च हुआ, वह जरूरत कब पूरी हुई?”
यही procurement policy को procedural efficiency से outcome-oriented efficiency की ओर ले जाने का रास्ता हो सकता है।
भारत का procurement framework पहले ही transparency, digital procurement, delivery period, contract management, logistics और supplier performance जैसे कई महत्वपूर्ण तत्वों को पहचानता है।
अब policy discussion को एक कदम आगे ले जाने की जरूरत है—procurement की सफलता को केवल खरीद की तारीख से नहीं, उपयोग की वास्तविक तारीख से भी देखना।
क्योंकि सरकारी खरीद का अंतिम उद्देश्य सामान खरीदना नहीं है।
अंतिम उद्देश्य है—सही वस्तु या सेवा, सही गुणवत्ता में, सही जगह पर, सही समय पर पहुंचकर वास्तविक जरूरत को पूरा करे।
यही “arrival reality” procurement policy का अगला महत्वपूर्ण परीक्षण बन सकता है।
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