- डेस्क टीम
डिजिटल अरेस्ट स्कैम : कल्पना कीजिए, आपके मोबाइल पर अचानक एक वीडियो कॉल आता है। दूसरी तरफ पुलिस की वर्दी पहने एक व्यक्ति बैठा है। वह खुद को किसी जांच एजेंसी का अधिकारी बताता है और दावा करता है कि आपके आधार कार्ड, बैंक खाते या मोबाइल नंबर का इस्तेमाल किसी आपराधिक गतिविधि में हुआ है। कुछ ही मिनटों में बातचीत का रुख बदल जाता है। आपको कैमरा चालू रखने, किसी से बात नहीं करने और कथित जांच पूरी होने तक निर्देशों का पालन करने के लिए कहा जाता है।
यही डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली साइबर ठगी का एक आम तरीका है।
इस तरह के मामलों में अपराधी सरकारी एजेंसियों की पहचान का दुरुपयोग करते हैं। फर्जी दस्तावेज, नकली पहचान पत्र और वीडियो कॉल के जरिए लोगों को वास्तविक जांच का भ्रम दिया जाता है। इसके बाद उनसे पैसे ट्रांसफर करने या बैंक से जुड़ी गोपनीय जानकारी साझा करने का दबाव बनाया जाता है।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने मई 2024 में जारी एक चेतावनी में इस तरह की ठगी के तौर-तरीकों का उल्लेख किया था। मंत्रालय के अनुसार, ठग पुलिस, सीबीआई, नारकोटिक्स विभाग, आरबीआई और अन्य एजेंसियों के अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं।
डिजिटल अरेस्ट स्कैम कैसे काम करता है?
इस ठगी में अपराधी अक्सर एक सुनियोजित प्रक्रिया अपनाते हैं। इसका उद्देश्य पीड़ित को डराकर जल्दबाजी में आर्थिक फैसला लेने के लिए मजबूर करना होता है।
1. अनजान कॉल या संदेश
ठग फोन करके बताते हैं कि किसी पार्सल, सिम कार्ड, बैंक खाते या पहचान पत्र का संबंध किसी कथित अपराध से है।
2. सरकारी अधिकारी होने का दिखावा
वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी, फर्जी कार्यालय और नकली दस्तावेज दिखाकर भरोसा जीतने की कोशिश की जाती है।
3. गिरफ्तारी का डर और अलग-थलग करना
पीड़ित को कॉल पर बने रहने, परिवार को जानकारी न देने और कथित जांच के बारे में किसी से बात नहीं करने को कहा जाता है।
4. पैसे ट्रांसफर करने का दबाव
ठग जांच, सत्यापन, जमानत या खाते की सुरक्षा जैसे बहाने बनाकर रकम मांग सकते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे अहम हथियार तकनीक नहीं, बल्कि डर और मानसिक दबाव है। जब व्यक्ति खुद को कानूनी संकट में समझने लगता है, तो वह सामान्य परिस्थितियों में लिए जाने वाले सावधानीपूर्ण फैसले भी जल्दबाजी में कर सकता है।
ताजा मामला: राजकोट में डॉक्टर से 58.5 लाख रुपये की ठगी
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर ठगी का एक ताजा मामला गुजरात के राजकोट से सामने आया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की 1 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 80 वर्षीय एक स्त्री रोग विशेषज्ञ को चार दिनों तक वीडियो कॉल के जरिए कथित तौर पर निगरानी में रखा गया। इस दौरान उनसे लगभग 58.5 लाख रुपये ट्रांसफर कराए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक, ठगों ने जांच का डर दिखाकर उन्हें लगातार अपने संपर्क में रखा। मामले की जांच की जा रही है। यह घटना बताती है कि डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी में उम्र या पेशे से जुड़ी पहचान किसी व्यक्ति को पूरी तरह सुरक्षित नहीं बनाती।
क्या सच में किसी को डिजिटल अरेस्ट किया जा सकता है?
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर वीडियो कॉल के जरिए किसी व्यक्ति को हिरासत में रखने का कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। किसी व्यक्ति को फोन या वीडियो कॉल पर पैसे जमा करने के लिए मजबूर करना किसी आधिकारिक जांच प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा नहीं है।
हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि पुलिस या जांच एजेंसियां फोन पर कभी संपर्क नहीं करतीं। किसी वास्तविक मामले में संपर्क होने पर संबंधित एजेंसी की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है।
भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने भी स्पष्ट किया है कि कोई नियामक संस्था फोन, मैसेजिंग ऐप या वीडियो प्लेटफॉर्म के माध्यम से जांच के नाम पर भुगतान नहीं मांगती।
डिजिटल अरेस्ट से बचने के लिए क्या करें?
साइबर ठगी से बचाव के जरूरी कदम
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किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर पैसे ट्रांसफर न करें।
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वीडियो कॉल पर दिखाई जा रही वर्दी, पहचान पत्र या दस्तावेज को वास्तविक मानकर भरोसा न करें।
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कॉल काटकर संबंधित सरकारी एजेंसी के आधिकारिक संपर्क माध्यम से जानकारी की पुष्टि करें।
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अपना ओटीपी, बैंकिंग पासवर्ड, पिन या स्क्रीन शेयरिंग की अनुमति किसी अनजान व्यक्ति को न दें।
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परिवार या किसी भरोसेमंद व्यक्ति को घटना की जानकारी दें।
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संदिग्ध कॉल, संदेश और भुगतान संबंधी प्रमाण सुरक्षित रखें।
यदि आपके साथ साइबर वित्तीय धोखाधड़ी हो चुकी है, तो तुरंत 1930 पर कॉल करें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें।
महत्वपूर्ण हेल्पलाइन
1930
राष्ट्रीय साइबर वित्तीय धोखाधड़ी हेल्पलाइन
वेबसाइट:
डिजिटल सुरक्षा केवल तकनीक का नहीं, जागरूकता का भी सवाल
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर होने वाली ठगी को रोकने के लिए केवल मजबूत पासवर्ड और सुरक्षित बैंकिंग पर्याप्त नहीं हैं। लोगों को यह समझना भी जरूरी है कि कोई व्यक्ति सरकारी अधिकारी बनकर फोन पर धमकी दे सकता है और तकनीक के जरिए वास्तविकता जैसा दिखने वाला माहौल बना सकता है।
परिवारों में बुजुर्गों, बच्चों और डिजिटल भुगतान का नियमित इस्तेमाल करने वाले लोगों के साथ इस तरह की ठगी के तरीकों पर चर्चा करना उपयोगी हो सकता है।
डिजिटल दुनिया में सतर्कता का सबसे जरूरी नियम यही है कि किसी भी धमकी, कथित कानूनी कार्रवाई या तत्काल भुगतान की मांग पर घबराकर फैसला न लें।
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