बॉलीवुड का एक अनसुना किस्सा: जब आनंद बक्शी को अपने ही गीत पर हुआ अफसोस
बॉलीवुड के मशहूर गीतकार आनंद बक्शी का नाम उन शब्दकारों में शुमार होता है, जिनकी कलम ने भावनाओं को आम लोगों तक पहुंचाया। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतने महान गीतकार को कभी अपने ही लिखे एक गाने पर अफसोस भी हुआ था?
यह कहानी है 1983 में रिलीज हुई फिल्म ‘अंधा कानून’ की, जिसमें अमिताभ बच्चन ने जां निसार खान नाम के एक मुस्लिम किरदार का रोल निभाया था।
‘जितनी चाभी भरी राम ने…’ पर क्यों हुआ पछतावा?
आनंद बक्शी ने इस फिल्म के लिए एक भावनात्मक गीत लिखा था –
“रोते-रोते हंसना सीखो, हंसते-हंसते रोना,
जितनी चाभी भरी राम ने, उतना चले खिलौना”
गाना सुपरहिट रहा, लेकिन बाद में जब बक्शी साहब को पता चला कि अमिताभ बच्चन इस फिल्म में मुस्लिम किरदार निभा रहे हैं, तो उन्हें गहरे अफसोस का अनुभव हुआ। उन्होंने अपने बेटे राकेश आनंद बक्शी से कहा:
“मुझसे गलती हो गई थी। मैंने गाना लिखने से पहले यह नहीं पूछा कि किरदार का मजहब क्या है। अगर पता होता कि वो मुस्लिम है तो मैं उसके तहज़ीब और आस्था के अनुसार शब्दों का चयन करता।”
यह किस्सा उनकी जीवनी ‘नग्मे, किस्से, बातें, यादें’ में दर्ज है, जिसे उनके बेटे ने लिखा है।
आनंद बक्शी: शब्दों का जादूगर
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जन्म: 21 जुलाई 1930, रावलपिंडी (अब पाकिस्तान)
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पहला ब्रेक: 1958, फिल्म भला आदमी से (4 गाने, 150 रुपये में)
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पहचान: 1965 की जब जब फूल खिले
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यादगार गीत: “परदेसियों से ना अखियां मिलाना”, “एक था गुल…”
उनके कुछ सदाबहार गीत
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“तुझे देखा तो ये जाना सनम”
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“कोरा कागज था ये मन मेरा”
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“हमको हमी से चुरा लो”
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“चिट्ठी न कोई संदेश”
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“रूप तेरा मस्ताना”
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“उड़ जा काले कावां”
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“टिप टिप बरसा पानी”
आनंद बक्शी ने 4 दशकों में 4000+ गाने लिखे, जो आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
आखिरी अलविदा
30 मार्च 2002 को इस गीतों के शिल्पी ने दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनके गीत आज भी हर दिल में ज़िंदा हैं।
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