- न्यूज मंत्रा लाइव नेशनल डेस्क
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम
सैन्य प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग होने वाले कैडेट्स की स्थिति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने इस मामले पर स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार, वायुसेना, थल सेना और नौसेना को नोटिस जारी किया है।
📌 पृष्ठभूमि
एक मीडिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि 1985 से अब तक लगभग 500 कैडेट्स प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांगता के चलते बाहर कर दिए गए। ये सभी कभी एनडीए (नेशनल डिफेंस एकेडमी) और आईएमए (इंडियन मिलिट्री एकेडमी) जैसे प्रतिष्ठित सैन्य संस्थानों में प्रशिक्षण ले रहे थे।
नियमों के अनुसार, जो कैडेट कमीशन से पहले दिव्यांग हो जाते हैं, उन्हें पूर्व सैनिक (Ex-Servicemen) का दर्जा नहीं मिलता। इस कारण वे ईसीएचएस (Ex-Servicemen Contributory Health Scheme) जैसी स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य सैन्य लाभों से वंचित रह जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा:
“हम चाहते हैं कि बहादुर लोग सेना में शामिल हों। लेकिन अगर उन्हें जरूरत पड़ने पर कोई आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा, तो यह उनके मनोबल को कमजोर करेगा।”
बेंच ने सरकार से पूछा कि क्या इन कैडेट्स के लिए कोई बीमा पॉलिसी है और क्या उन्हें सेना में किसी अन्य पद पर समायोजित करने की संभावना है।
अगली सुनवाई
अब इस मामले की अगली सुनवाई 4 सितंबर 2025 को होगी। तब तक केंद्र और तीनों सेनाओं को इस पर अपना पक्ष रखना होगा।
क्यों ज़रूरी है यह मुद्दा?
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प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग हुए कैडेट्स ने पहले ही राष्ट्र सेवा के लिए कदम बढ़ाया।
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उन्हें पूर्व सैनिकों जैसी सुविधाएं न मिलना न्यायसंगत नहीं।
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सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप न केवल न्याय दिला सकता है, बल्कि भविष्य में युवा कैडेट्स के मनोबल को भी मज़बूती देगा।
सैन्य सेवा केवल युद्ध का मैदान नहीं, बल्कि प्रशिक्षण के दौरान भी जोखिमों से भरी होती है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम दिव्यांग कैडेट्स के लिए सम्मान और न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।
👉 क्या आप मानते हैं कि प्रशिक्षण के दौरान दिव्यांग हुए कैडेट्स को पूर्व सैनिकों जैसी सुविधाएं मिलनी चाहिए? अपना विचार कमेंट में साझा करें और इस लेख को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।
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