- गुवाहाटी | ब्यूरो डेस्क
Quick View
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असम की राजनीति में ‘भूमिपुत्र’ और ‘अस्मिता’ का मुद्दा फिर से केंद्र में।
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BJP का ‘हिंदू-अस्मिता’ बनाम कांग्रेस का ‘साझा विरासत’ मॉडल आमने-सामने।
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NRC और CAA के बाद वोटिंग पैटर्न में भाषाई और धार्मिक ध्रुवीकरण के संकेत।
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क्षेत्रीय दलों की भूमिका और युवा मतदाताओं का बदलता नजरिया।
Identity Politics : असम विधानसभा चुनाव 2026 की आहट के साथ ही राज्य की राजनीति ‘अस्मिता’ (Identity) के इर्द-गिर्द सिमट गई है। असमिया राष्ट्रवाद, जो ऐतिहासिक रूप से घुसपैठ और भाषाई सुरक्षा पर आधारित रहा है, अब एक नए मोड़ पर है। जहां सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) इसे सांस्कृतिक सुरक्षा और ‘स्वदेशी’ अधिकारों से जोड़ रही है, वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला गठबंधन इसे समावेशी विकास और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का मुद्दा बना रहा है। यह चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि असम की भविष्य की पहचान तय करने वाला वैचारिक युद्ध बन गया है।
Asomiya Nationalism: वोटिंग पैटर्न में बदलाव
असमिया राष्ट्रवाद अब केवल ‘बाहरी’ बनाम ‘भीतरी’ तक सीमित नहीं रहा। पिछले कुछ वर्षों में वोटिंग पैटर्न में एक बड़ा बदलाव देखा गया है। बराक घाटी और ब्रह्मपुत्र घाटी के बीच का राजनीतिक अंतर अब और गहरा हुआ है। युवा मतदाता अब केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि ‘सस्टेनेबल आइडेंटिटी’ और आर्थिक सुरक्षा के आधार पर अपना मत तय कर रहे हैं। जनजातीय समूहों का झुकाव जिस ओर होगा, जीत का पलड़ा उसी ओर झुकेगा।
BJP vs Congress: नैरेटिव की लड़ाई
भाजपा का नैरेटिव ‘अहोम गौरव’ और 800 साल के इतिहास के इर्द-गिर्द बुना गया है, जिसमें वे खुद को अवैध प्रवासियों के खिलाफ एकमात्र रक्षक के रूप में पेश करते हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस ‘असमिया पहचान’ को एक बहुसांस्कृतिक छतरी के रूप में देख रही है, जिसमें चाय बागान श्रमिकों और अल्पसंख्यक समुदायों को भी समान स्थान देने की बात कही जा रही है। यह ‘एक्सक्लूसिव’ बनाम ‘इंक्लूसिव’ राष्ट्रवाद की सीधी जंग है।
“असम की अस्मिता हमारे लिए केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि इस मिट्टी की आत्मा है। हम हर कीमत पर स्वदेशी लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे।” – असम के एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी
Key Facts
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जनसांख्यिकीय बदलाव: असम की 3.1 करोड़ आबादी में लगभग 34% मुस्लिम आबादी है, जो कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाती है।
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सीटों का गणित: कुल 126 विधानसभा सीटों में से लगभग 40 सीटों पर जातीय और भाषाई पहचान सबसे बड़ा कारक है।
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परिसीमन का प्रभाव: हालिया निर्वाचन क्षेत्र परिसीमन (Delimitation) ने कई क्षेत्रों के राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं।
Timeline
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1979-1985: असम आंदोलन – विदेशी घुसपैठ के खिलाफ पहली बड़ी लहर।
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2019: CAA और NRC का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया।
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2021: पिछले चुनाव में अस्मिता और विकास के मेल से भाजपा की वापसी हुई।
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2025-2026: चुनाव पूर्व गठबंधन और पहचान आधारित रैलियों का दौर।
आने वाले महीनों में असम की राजनीति और अधिक ध्रुवीकृत होने की संभावना है। अस्मिता का मुद्दा न केवल वोट बटोरने का जरिया बनेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि आने वाले दशक में असम की सामाजिक संरचना कैसी होगी। यदि राजनीतिक दल केवल भावनाओं को भड़काते हैं, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव सामाजिक समरसता पर पड़ सकता है। अगला कदम विभिन्न समुदायों के बीच संवाद स्थापित करना और विकास को पहचान से जोड़ना होगा।
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Disclaimer: यह लेख वर्तमान राजनीतिक विश्लेषण और उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी दल या समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।
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